कार्य ही परिणाम निर्धारित करता है
कार्य ही परिणाम निर्धारित करता है
बहुत से लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं, "आप इतनी अच्छी तरह से आयोजित सभाओं के लिए धन कहाँ से लाते हैं?" कुछ लोग तो यह भी कहते हैं, "हमें आपकी तरह सहयोग करने वाला कोई नहीं है।"
आज मैं अपने विश्वास की यात्रा का एक हिस्सा साझा करके इस प्रश्न का उत्तर देना चाहता हूँ।
जब हमने बिहार में अपनी मिशनरी सेवकाई की शुरुआत की, तब परमेश्वर ने हमारे हृदय में लोगों को उसके वचन की शिक्षा देने का बोझ रखा। हमने पूरे मन से प्रार्थना की और उससे पूछा कि वह हमें दिखाए कि इस बुलाहट को कैसे पूरा करें। जब हम प्रभु की प्रतीक्षा करते रहे, तब एक बात हमारे लिए बिल्कुल स्पष्ट हो गई—केवल परमेश्वर का वचन ही लोगों के जीवन को बदलने की सामर्थ्य रखता है।
इसी विश्वास के साथ हमने विश्वास का कदम उठाया। वर्ष 2012 में हमने 200 बच्चों के लिए अपना पहला वेकेशन बाइबल स्कूल (VBS) आयोजित किया। आर्थिक दृष्टि से यह असंभव प्रतीत होता था, परन्तु हमने परमेश्वर पर भरोसा रखा, और उसी ने हमारी सहायता की कि यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा हो सके।
बच्चों के बीच सेवा करने के बाद परमेश्वर ने हमारे हृदय में युवाओं के लिए भी विशेष बोझ रखा। हम बेगूसराय में दो-दिवसीय युवा सम्मेलन आयोजित करना चाहते थे। लेकिन एक बड़ी समस्या थी—हमारे पास न धन था, न कोई प्रायोजक, और न ही हमें प्रोत्साहित करने वाला कोई व्यक्ति। फिर भी हमने अपने हृदय में इस प्रतिज्ञा को थामे रखा:
"यदि दर्शन परमेश्वर देता है, तो उसकी पूर्ति के लिए आवश्यक प्रबंध भी वही करेगा।"
हमने विश्वासपूर्वक प्रार्थना की और अपनी आवश्यकता दूसरों के साथ साझा की, इस आशा में कि कोई हमारे साथ सहभागी बनेगा। कई सप्ताह बीत गए, लेकिन कहीं से कोई सहायता नहीं मिली। एक युवा सम्मेलन आयोजित करने के लिए उपयुक्त स्थान, बाइबल शिक्षक, भोजन और अनेक अन्य व्यवस्थाओं की आवश्यकता थी। मानवीय दृष्टि से यह हमारी सामर्थ्य से बाहर था।
अंततः हमें यह समझ में आया कि यदि यह बोझ वास्तव में परमेश्वर की ओर से है, तो विश्वास का पहला कदम हमें ही उठाना होगा।
हमारे पास केवल एक ही विकल्प था—अपने ही संसाधनों का उपयोग करना। लेकिन हमारे पास कोई बचत भी नहीं थी।
उस समय मेरी पत्नी एक विद्यालय में अध्यापिका थीं। उन्होंने अपने वेतन का अग्रिम माँगा और उन्हें ₹10,000 प्राप्त हुए। वही राशि परमेश्वर के कार्य में विश्वास के साथ बोया गया हमारा पहला बीज बनी।
परमेश्वर के अनुग्रह से हम बेगूसराय में 70 युवाओं के लिए एक सुंदर दो-दिवसीय युवा सम्मेलन सफलतापूर्वक आयोजित कर सके।
हमें आशा थी कि स्थानीय पास्टर हमारा सहयोग करेंगे, लेकिन कोई भी आगे नहीं आया। फिर भी हमने हिम्मत नहीं हारी। वर्ष दर वर्ष हम अपने परिवार के सीमित संसाधनों का उपयोग करते हुए विभिन्न कलीसियाओं में युवा सम्मेलनों का आयोजन करते रहे और अपनी आवश्यकताओं के लिए परमेश्वर पर भरोसा रखते रहे।
बाद में परमेश्वर ने हमारे लिए एक और द्वार खोला। हमने गया जिले में 40 परिवारों के लिए एक पारिवारिक संगोष्ठी आयोजित की—वह भी स्थानीय कलीसिया से किसी आर्थिक सहायता के बिना। तब से आज तक परमेश्वर ने हमें बिहार, नेपाल और ओडिशा में अनेक सम्मेलन, प्रशिक्षण कार्यक्रम और सेमिनार आयोजित करने का अवसर दिया है।
अनेक बार हमने लोगों से सहायता की आशा की, परन्तु कोई सहायता नहीं मिली। लेकिन उन्हीं परिस्थितियों का उपयोग परमेश्वर ने हमारे विश्वास को और अधिक दृढ़ बनाने के लिए किया। हमने सीखा कि हमारा भरोसा कभी मनुष्यों पर नहीं, बल्कि केवल प्रभु पर होना चाहिए।
इन सेवकाइयों को आगे बढ़ाना हमारे परिवार के लिए कभी आसान नहीं था। हमारे संसाधन सीमित थे, फिर भी परमेश्वर ने हमेशा हमारी आवश्यकताओं को पूरा किया ताकि हम उसकी सेवा निरंतर करते रहें। आज पीछे मुड़कर देखने पर मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि परमेश्वर ने हमें कभी निराश नहीं किया।
मैं अक्सर अपनी पत्नी से कहा करता था,
"यदि दर्शन परमेश्वर देता है, तो उसके लिए आवश्यक प्रबंध भी वही करेगा।"
हम केवल अपने भाग को विश्वासयोग्य होकर निभाते रहे, और परमेश्वर ने भी अपने भाग को सदैव विश्वासयोग्यता से पूरा किया।
आज लोग सुव्यवस्थित सम्मेलन, प्रशिक्षण कार्यक्रम और सेमिनार देखते हैं। लेकिन वे अक्सर उन छोटे-छोटे त्यागों, अनगिनत प्रार्थनाओं, उधार लिए गए पैसों और विश्वास के उन कदमों को नहीं देख पाते, जो वर्षों पहले बोए गए थे।
आज जो फसल हम देख रहे हैं, वह उन बीजों का परिणाम है जिन्हें हमने उस समय बोया था जब इस दर्शन पर विश्वास करने वाला कोई नहीं था।
आज परमेश्वर ने हमारी सेवकाई में ऐसे अद्भुत सहभागी दिए हैं जो हम पर विश्वास करते हैं और आनंदपूर्वक परमेश्वर के राज्य के कार्य में अपना योगदान देते हैं। हम उन प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं।
इस पूरी यात्रा ने मुझे एक सरल लेकिन अत्यंत सामर्थी सत्य सिखाया है—
कार्य ही परिणाम निर्धारित करता है।
विश्वास केवल यह मान लेना नहीं है कि परमेश्वर कुछ कर सकता है। सच्चा विश्वास यह भी है कि जब परमेश्वर बुलाए, तब संसाधन दिखाई न देने पर भी पहला कदम उठा लिया जाए।
जैसा कि गलातियों 6:7 में लिखा है:
"धोखा न खाओ; परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता, क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा।"
आज हम जो बीज विश्वास, त्याग, प्रार्थना और आज्ञाकारिता में बोते हैं, वे परमेश्वर के सिद्ध समय पर अवश्य भरपूर फल लाएँगे।
मेरी प्रार्थना है कि यह गवाही आपको विश्वासयोग्यता के साथ बीज बोते रहने के लिए प्रोत्साहित करे, चाहे परिणाम तुरंत दिखाई न दें। परमेश्वर अपनी महिमा के लिए बोए गए किसी भी बीज को कभी नहीं भूलता।
हम जो कुछ भी करें, उसमें परमेश्वर की महिमा हो।परमेश्वर आपको बहुतायत से आशीष दे।
Blessed Sagar
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